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कौशल-जीवन -४

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4 बच्चे कितना भी बड़े हो जायें वे माँ-बाप की नज़रो में बच्चे ही होते हैं। यही वजह है कि अमर के हाईस्कूल पहुँच जाने के बाद भी विमला और सुरेश उसे अकेले भेजने से हिचकिचाते थे । अमर उनके रोक-टोक से चिड़चिड़ा जाता था, और बोल पड़ता था कि वह बच्चा नहीं रहा। लेकिन उसकी कौन सुनता।  खारुन में एनिकट में डूब मरने की घटना आये दिन होने लगी थी, लेकिन बच्चे कहाँ मानने वाले थे। वे प्रायः हर रविवार को नदी में नहाने चले ही जाते थे। थोड़ी भी देर होती तो विमला की चिंता बढ़ जाती, और सुरेश को विमला के जिद के चलते उन्हें लाने जाना हाई पड़ता । ऐसे ही एक दिन अमर और विजय के देर हो जाने पर सुरेश उन्हें लेने नदी तट पर पहुँचा तो यह देखकर हैरान रह गया कि विजय एक पेड़ के नीचे खड़ा किसी से बात कर रहा है, सुरेश को लाख चेष्टा के बाद भी कोई और दिखाई नहीं दिया तो वह थोड़ी नज़दीक पहुँच गया। तब भी कोई नहीं दिख रहा था , हाँ विजय की आवाज़ सुनाई दे रही थी लेकिन आवाज़ स्पष्ट नहीं था। सुरेश डर गया, और विजय को ज़ोर से आवाज़ दी तो वह चुपचाप चला आया। सुरेश ने जब उससे पूछा कि वह किससे बात कर रहा था तो उसने कोई उत्तर नहीं दिया। ह...

कौशल-जीवन -३

3  अमर के मुंडन संस्कार के लिए पंडित जी द्वारा निर्धारित तिथि को अब एक सप्ताह ही रह गया था, भोरमदेव जाने की सारी तैयारियाँ पूरी कर ली गई। यह भी तय किया गया कि भोरमदेव से लौटने के दूसरे दिन ही भगवान श्री सत्यनारायण की कथा हवन के पश्चात मोहल्ले व परिवार वालों को भोजन भी कराया जाएगा और इसी दिन बाबा के द्वारा दिए रुद्राक्ष को भी पहना देंगे।आख़री समय में यात्रा में परिवर्तन कर दिया गया , और भोरमदेव से लौटते में डोंगड़गढ़ में माता बमलेश्वरी देवी के दर्शन का कार्यक्रम जोड़ दिया गया । निर्धारित तिथि और समय पर सब भोरमदेव पहुँच गए । भोरमदेव पहुँचते ही अमर में परिवर्तन देख सब ख़ुश हो गए , अब तक चुप रहने वाले अमर की चंचलता देखते ही बन रहा था , मंदिर में दर्शन के दौरान वह उछलकूद करने लगा उसे संभालना मुश्किल हो रहा था । शिव जी के दर्शन पश्चात मुंडन संस्कार का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । फिर सभी भोरमदेव के मनोरम दृश्य का आनंद लेने लगे। 10 वी शताब्दी के इस मंदिर की भव्यता और सुंदरता स्थापत्य शिल्पकला का बेजोड़ नमूना है। नागर शैली के इस बेजोड़ मंदिर का निर्माण नागवंशी राजा ने की है, ।मंदिर के चारो ओर म...